सावन का महीना बहुत ही पावन होता है। यह भगवान शिव का महीना है, जो तीनों लोकों के स्वामी हैं; उनकी तुलना किसी से संभव ही नहीं है। सावन में हम सभी देवों के देव महादेव की आराधना करते हैं, किंतु सावन के पावन मास की बात ही कुछ निराली होती है—जब संपूर्ण सृष्टि केवल ‘शिवमय’ हो उठती है। शिव केवल पूजा के विषय नहीं हैं, बल्कि उनके दिव्य जीवन से हमें जीवन सीखने की आवश्यकता है।
जब मैं इस कविता को लिख रहा था, तब मेरा मन एक दम शांत था। मेरी आँखों के समक्ष केवल हिमालय की चोटियाँ और भगवान शिव का रूप ही तैर रहा था। यह भावपूर्ण रचना मेरी काव्य-रचना ‘मीमांसा’ से है।
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस शिव की हम पूजा करते हैं, उनका वास्तविक स्वरूप क्या है? एक सुंदर कविता के माध्यम से आइए शिव के उस अनूठे, वैरागी और कल्याणकारी रूप को समझें।
सावन में शिव स्तुति: शिव को रोता देखा किसने?
शिव को रोता देखा किसने?
अपनी झोली भरता देखा किसने?भूतों की माला डाले,
सर्प-बिच्छू अपने तन के हवाले,नाचता वह हिमालय पर;
विषपान करता, अपने कंठ में धरता,
सुधा-फूल बरसाता, किसने देखा शिव को!
शिव को रोता देखा किसने?दुख की वेदी को गले लगाता!
अपनी आत्म-इच्छा को हरते!
किसने देखा है शिव को रोता?क्या शिव सुखी नहीं हैं?
शिव ही तो पूर्ण हैं,
शिव को रोता देखा किसने?
1. अपनी झोली भरता देखा किसने?
सावन में हम शिव जी को प्रसन्न करने के लिए जल, दूध और बेल पत्र अर्पित करते हैं। जिनके पास संसार की सारी धन-वैभव सेवा में खड़े हैं, वे स्वयं बर्फ से ढके कैलाश पर फकीर की तरह मगन रहते हैं। गले में भूतों की माला, तन पर सर्प और बिच्छू—वे कभी अपनी झोली भरने नहीं निकलते, बल्कि पूरी सृष्टि की झोली भरते हैं।
घर का कोई बड़ा इंसान (जैसे माता-पिता) खुद कितनी भी तकलीफ में हो, पुराने कपड़े पहन ले, सारे कष्ट सह ले, लेकिन बच्चों के सामने कभी रोता नहीं है। वह अपने दुखों को छुपाकर परिवार को सिर्फ खुशियां देता है। शिव भी इस पूरी दुनिया के लिए वैसे ही बड़े हैं।
सावन का महीना समुद्र मंथन की कथा से भी जुड़ा है। जब सृष्टि को बचाने के लिए भयानक ‘हलाहल विष’ निकला, तो शिव ने उसे न तो निगला और न उगला—उसे अपने कंठ (गले) में ही धारण कर लिया और ‘नीलकंठ’ कहलाए।
दुनिया भले ही आपको कड़वाहट, विष या कड़वे बोल दे, उसे अपने मन और आत्मा तक मत उतरने दीजिए। उसे गले में ही शांत कर दीजिए और बदले में दुनिया पर केवल प्रेम, दया और अमृत (सुधा) ही बरसाइए।
2.दुख की वेदी को गले लगाता!
सुख को तो हर कोई गले लगाता है, लेकिन शिव की महानता इसमें है कि वे दुख की वेदी को भी मुस्कुराकर स्वीकार करते हैं। वे अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं (आत्म-इच्छा) के गुलाम नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं में तृप्त हैं। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं और अहम का त्याग कर देता है, उसे संसार का कोई दुख तोड़ नहीं सकता। शिव इसीलिए ‘पूर्ण’ हैं—क्योंकि वे सुख और दुख दोनों से परे हैं।
आम इंसान सोचता है कि बड़े बंगले, अच्छे कपड़े और पैसों में खुशी है। लेकिन शिव भूतों की माला पहनकर और बर्फीले पहाड़ पर रहकर भी आनंद में नाच रहे हैं। इसका मतलब है—असली खुशी चीज़ों में नहीं, मन की शांति में होती है।
मनुष्य के हृदय में शिव निवास करते हैं। एकांत में अपने हृदय की आवाज़ सुनने की कोशिश कीजिए; उस अंतरात्मा से लिया गया जीवन का कोई भी निर्णय कभी मनुष्य को पीछे मुड़कर देखने या पछतावे की ओर नहीं ले जाता।
आज अपने हृदय की सुनना छोड़ दिया है और स्वार्थ में आकर उस भीतर की आवाज़ को नकारते जा रहे हैं। हर मनुष्य अपने शरीर और जीवन को स्वस्थ रखने के लिए हर संभव उपाय करता है, लेकिन कभी अपनी आत्मा की आवाज़ नहीं सुनना —यही जीवन के पतन का सबसे बड़ा कारण है।
जब इंसान की कोई ख्वाहिश ही नहीं बची, तो उसे अपनी तकलीफ का रोना रोने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। वे सब कुछ सहकर भी अंदर से शांत और संतुष्ट हैं।
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Har Har Mahadev
शिव ही सत्य है।
महादेव, शांत ध्यान और लीन।
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