ज़िंदगी में कुछ सन्नाटे ऐसे होते हैं जो कान फाड़ देने वाले शोर से भी ज्यादा तेज़ गूँजते हैं। पिता का साया सिर्फ एक सुरक्षा नहीं, बल्कि वह छत होती है जिसके नीचे हम बेफिक्र होकर हँसते हैं। जब यह छत छीन जाती है, तो यह पूरी दुनिया पराई लगने लगती है। ऐसा लगता है जैसे हर कोई इस अकेलेपन का फायदा उठाने के लिए तैयार खड़ा है।
यह कविता किसी कल्पना से नहीं, बल्कि लहू में सुलगते उस शोले और दर्द की उपज है जो हर उस बच्चे का यथार्थ है जिसने अपने पिता को खोया है…
कविता: पिता की याद में मासूम का दर्द
फिर वही ज़िंदगी, फिर वही सन्नाटा,
कौन है यहाँ अपना, कोई नहीं तुम्हारे सिवा पापा।
ये रक्त से भरी आँखें,
लहू में सुलगता है जैसे कोई शोला।
एक बार हाथ मेरा पकड़ लो,
मैं भूल जाऊँगी यह सारी दुनिया।
लौट आओ ना एक बार, कि हँस लूँ इस ज़िंदगी में,
अब सन्नाटा ही गूँज रहा, इस जीवन को हर कोई लूट रहा।
1. सन्नाटा और अकेलापन:
दुनिया में चाहे जितने भी लोग हों, लेकिन पिता के बिना यह दुनिया पूरी तरह अजनबी और पराई लगती है। जब आँखें रोते-रोते लाल हो जाती हैं और दिल के भीतर एक गुस्सा, एक तड़प सुलगने लगती है, तब बस यही मन करता है कि काश वह पुराना वक़्त लौट आए। काश पापा एक बार आकर हाथ थाम लें, ताकि इस मतलबी दुनिया का डर हमेशा के लिए ख़त्म हो जाए।
पिता वह ढाल होते हैं जिसके आगे दुनिया की हर मुसीबत नतमस्तक हो जाती है। वे सुरक्षा की एक ऐसी दीवार हैं जिसे भेद पाना नामुमकिन है। यह सन्नाटा और अकेलेपन की चीख मैंने बहुत ही करीब से महसूस किया है—यह दिल को दहला देने वाला होता है। जीवन में जो कुछ भी दिखता है, उस सब में पापा की ही याद है। हर पल, हर जगह बस एक ही गुहार होता है—“पापा, आप कहाँ चले गए?” यह अकेलापन साँस लेना भी मुश्किल कर देता है।
2. सुलगता दर्द
आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी हैं और दिल के अंदर एक अनकहा दर्द शोले की तरह जलता रहता है। जब दर्द बर्दाश्त की सीमा पार कर जाता है, तो वह आँसुओं के रास्ते बह निकलता है।
रो-रोकर लाल हो चुकी ये आँखें और सीने में सुलगता हुआ यह दर्द—यह सिर्फ़ दुख नहीं है, यह पिता से दूर होने का वह आक्रोश है जिसे कोई शब्द बयान नहीं कर सकता। यह अहसास इंसान को अंदर ही अंदर खोखला करने लगता है।
3. सुरक्षा की आस:
पिता का हाथ थामते ही इंसान दुनिया के सारे दुखों को भूलकर खुद को सबसे महफूज महसूस करता है। पिता का साया हमारे जीवन की सबसे बड़ी ढाल होता है।
पिता घर की उस छत की तरह होते हैं, जिसके हटते ही इंसान सीधे धूप, बारिश और तूफ़ान के थपेड़ों का शिकार होने लगता है। पिता के न रहने पर यह दुनिया बहुत क्रूर लगने लगती है—हर कोई आपकी बेबसी और लाचारी का फ़ायदा उठाने की कोशिश करता है। जीवन से हँसी-ख़ुशी ग़ायब हो जाती है और चारों तरफ़ बस छल-कपट का शोर रह जाता है।
4. लौट आने की गुहार:
जीवन में जो हँसी और सुकून पापा के साथ था, वह अब कहीं गुम हो चुका है। अब चारों तरफ़ सिर्फ़ एक सन्नाटा है। यह मन मानने को तैयार ही नहीं होता कि वह हाथ अब कभी मेरे हाथ में नहीं होगा। बस एक बार फिर से वह सब जीना चाहता, जो अपने पापा के साथ जिया था।
क्या वह संजीवनी कहीं नहीं है जो मेरे पिता को वापस ला सके? दिन तो किसी तरह गुज़र जाता है, लेकिन रात का अँधेरा इतना घना होता है कि पिता के हाथ के बिना मृत्यु भी छोटी लगने लगती है। “कोई किसी का घोंसला (आशियाना) नहीं देखता” आपकी याद में जीवन, मृत्युशय्या पर पड़े इंसान के दर्द से भी ज़्यादा तड़प देता है।
बस एक बार लौट आओ पापा… आपको एक नज़र देख कर यह जीवन मुक्त हो जाए।
क्या आपने भी कभी पापा से दूर होकर इस तरह का खालीपन महसूस किया है?
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Papa per likha yai kavita bhut acchi hai.jo jeevan kai satya ko batata hai.papa per likhi kavita ka her ek line satya hai
पिता जीवन की नींव हैं, जिस पर पूरी की पूरी जिंदगी टिकी रहती है। उनका छूट जाना जीवन की बुनियाद को हिला देता है।
Pita ki maujoodgi suraj ki tarah hoti hai—suraj garam zaroor hota hai, lekin agar na ho toh andhera chha jata hai.
Yeh ek aisa gham hai jo waqt ke saath kam nahi hota, bas insaan is dard ke saath jeena seekh leta hai. Unki yaadein, unki di hui shiksha aur unka pyar hamesha hamare saath rehta hai.
Yeh ek aisa dard hai jo koi aur kabhi bhar nahi sakta.
mere pass shabd nahi hai, kya bolu main?