माँ की सोती ममता

माँ की ममता से आधुनिक माँ तक: 4 कड़वे सच!

कल्पना कीजिए उस दृश्य की—एक मासूम बच्चा अपनी माँ का ध्यान खींचने के लिए रोता है, उसे पुकारता है। लेकिन […]

कल्पना कीजिए उस दृश्य की—एक मासूम बच्चा अपनी माँ का ध्यान खींचने के लिए रोता है, उसे पुकारता है। लेकिन माँ अपने काम या अपनी उलझनों में इतनी खोई है कि उसे वह पुकार सुनाई ही नहीं देती।

दुनिया का सबसे छोटा शब्द ‘माँ अपने अंदर पूरी सृष्टि का सार समेटे हुए है। माँ केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि सहनशक्ति, प्रेम और सुरक्षा की वह आख़िरी शिला है जिस पर किसी बच्चे की नींव टिकती है। लेकिन आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी, प्रतिस्पर्धा और बदलती जीवनशैली के बीच कहीं न कहीं ममता का वह निश्चल रूप धुंधला होता जा रहा है।

“प्रारंभ है, अंत है, माँ! शब्द छोटा, शक्ति की आख़िरी शिला है…”

कविता: मासूम की अनसुनी पुकार

प्रारंभ है, अंत है, माँ!
शब्द छोटा, शक्ति की आख़िरी शिला है!

पर चोट मैं आज खा जाता हूँ!
ममता से दूर होती यह निर्मम जन्म,
कठोर हो चुकी अपने आवरण में!
सो चुकी है वह अपनी ही निद्रा में!

सब छूटता जा रहा है नारी,
कदम-कदम घर-आँगन में!

बच्चा रो रहा, सो रहा?
अपना आँसू खुद ही पी रहा!
बस तोड़-जोड़ रहा अपनी चंचलता,
रुक जा ए नार, थोड़ा झुक जा नार!

1. आधुनिकता का आवरण:

आज की नारी सशक्त हो रही है, आगे बढ़ रही है—यह बेहद गर्व की बात है। लेकिन इस होड़ में कई बार हम अपने ही बनाए अहंकार में इतने कठोर होते जा रहे हैं कि अपनी मूल संवेदनाओं को पीछे छोड़ देते हैं।

ममता उसका मूल स्वभाव है। जब एक माँ आधुनिकता की दौड़ में अपने बच्चे की भावनात्मक ज़रूरतों को अनदेखा कर देती है, तो वह सिर्फ ममता नहीं खोती। स्त्री, जो हमेशा से सृजन, करुणा और प्रेम का प्रतीक रही है, जब वह अपनी ही संतान की पुकार के प्रति पत्थरदिल हो जाती है, तो वह अपने भीतर की प्रकृति को मार रही होती है।

2. बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव:

“बच्चा रो रहा, सो रहा! अपना आँसू खुद ही पी रहा”

जब घर के भीतर ममता, धैर्य, धीरज और अपनत्व की जगह व्यस्तता, तनाव और कठोरता ले लेती है, तो घर का आँगन धीरे-धीरे बिखरने लगता है। सफलता के शोर में घर के भीतर की कुछ सिसकियाँ दब कर रह जाती है। आज की विडंबना यह है कि हम पूरी दुनिया से जुड़े हुए हैं, पर अपने ही अंश से कटते जा रहे हैं। हम आज कैसी युवा शक्ति” की नींव रख रहे हैं ?

जब एक बच्चे को माँ का स्पर्श और समय नहीं मिलता, तो वह भावनात्मक उपेक्षा का शिकार हो जाता है। बच्चा रोता है, लेकिन जब कोई चुप कराने वाला नहीं होता, तो वह अपनी भावनाओं को दबाना सीख जाता है। इससे उसकी स्वाभाविक चंचलता और मासूमियत असमय ही समाप्त होने लगती है।

यह सिर्फ एक बच्चे का चुप होना नहीं है; यह एक मासूम की उम्मीद का टूटना है। जब एक बच्चा समझ जाता है कि उसके रोने का माँ पर कोई असर नहीं हो रहा, तो वह रोना नहीं छोड़ता, वह अपनी माँ से ‘उम्मीद’ करना छोड़ देता है।

यह दृश्य किसी भी समाज के लिए एक चेतावनी की तरह है कि हम अपने भविष्य (बच्चों) को किस तरह की दुनिया सौंप रहे हैं।

3. ‘झुकने’ और ‘रुकने’ की दार्शनिक अपील:

“रुक जा ए नार, थोड़ा झुक जा नार”

रुक जा ए नार, थोड़ा झुक जा नार! – किसी बंधन या गुलामी का प्रतीक नहीं है, बल्कि ‘लचीलेपन’ और ‘सहानुभूति’ का आह्वान है। जैसे पेड़ फल आने पर झुकता है, वैसे ही नारी का थोड़ा झुकना पूरे घर और बच्चे के जीवन को बिखरने से बचा सकती है। यह प्रगति के खिलाफ नहीं, बल्कि प्रगति और परिवार के संतुलन की माँग है|

अपने परिवार, अपने बच्चे और अपनी स्वाभाविक संवेदनाओं के लिए थोड़ा समय निकालना और प्रेम से झुकना है। प्रगति तभी सार्थक है जब उसके साथ घर-आँगन की खुशियाँ और बच्चों का निश्छल बचपन भी सुरक्षित रहे।

आधुनिक जीवनशैली, करियर की अंधी दौड़, या अपनी व्यक्तिगत आवरण के कारण नारी अपनी उस सबसे बड़ी ताकत—’ममता’—से दूर हो रही है। वह अपने ही बनाए खोल में इतनी व्यस्त है कि उसे आसपास बिखरते रिश्तों का एहसास ही नहीं हो रहा।

4. निष्कर्ष:

क्या माँ और माँ की ममता में कोई समस्या है? नहीं! बिल्कुल नहीं! लेकिन आज एक ऐसी आधुनिक सोच पनप रही है, जहाँ ‘मैं’ यानी स्वयं को सर्वोपरि स्थान पर रखा जा रहा है। ममता तो आज भी जीवित है, लेकिन मृत्युशय्या पर लेटी हुई। वह अपनी अंतिम सांसें ले रही है, और यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक हम इसे केवल नाम मात्र के लिए डूबते सूरज और पवन की अचेत अवस्था की तरह छोड़ देंगे।

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5 thoughts on “माँ की ममता से आधुनिक माँ तक: 4 कड़वे सच!”

  1. मां, ममता, मातृत्व, और स्नेह, संवेदना, एवं स्पर्श ।

  2. Kuch kuch jagah to aaj is se kahi jada khtarnak hai. Ham aaj paise ke piche itne jada jhukate ja rahe hai ki bachcha or mamata dono chhutta ja raha hai.

  3. Aradhana Sinha

    बहुत सुंदर तरीके से बातों को प्रस्तुत किया गया है।मुझे इसके विचार बहुत सुंदर हैं। इस वेबसाइट पर हर इंसान को विजिट करना चाहिए l

  4. Pingback: पिता की याद pita ki yadd

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