आजादी; क्या आज सच में आजाद हैं या गुमराह? अगर शारीरिक रूप से कहें तो आजाद हो गए हैं, और ये अपना देश भी 1947 से 2026 तक आजादी में ही साँस ले रहा है| पर किस तरह की आजादी में, क्या यह प्रश्न कभी भी हम सब के मन में आया !
1947 से हम जिस मानसिकता में अपने आप को ढालते और उसके पूरक होते आ रहे हैं, जिससे हमें आत्मविश्वास हो गया है की हम आजाद हैं | क्या हमारा भारत और हम सब 1947 से 2026 तक जो बदलाव देख रहे हैं ये ही आजादी और विकास है ?
अंग्रेज़ों के जाने के बाद हमने समझा कि हम आजाद हो गए। लेकिन सच यह है कि हमने लोहे की बेड़ियाँ खोलकर वासना, लालच, क्रोध और दिखावे की अदृश्य बेड़ियाँ पहन ली हैं।
आजादी कोई ऐसा अधिकार नहीं है जो एक बार मिल गया और ख़त्म हो गया; आजादी एक निरंतर कर्तव्य है, जिसे हर पल अपने सही आचरण से चुकाना पड़ता है।
स्वतंत्रता दिवस केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह यथार्थ है हमारी उस चेतना का, जो सदियों से अजर-अमर है। भारत केवल सीमाओं से बंधा एक देश नहीं, बल्कि विचारों, संस्कृतियों और ऊर्जा का एक जीवंत ब्रह्मांड है।
इस आजादी के पावन पर्व पर, प्रस्तुत है भारत की उसी अखंड भावना, शक्ति और सर्व धर्म समभाव को दर्शाती एक विशेष कविता:
कविता : स्वतंत्रता दिवस पर आजाद भारत के अस्तित्व की हुंकार
मैं रौद्र रूप रुद्र का,
धरा, नभ कौन जीते हमें?
मैं राख, मैं ज्वाला,
मैं शीतलता दृढ़ हिमालय का।देख लो तुम, गीता-कुरान सब समेटे हूँ,
गुरु गोबिंद हैं गुरूर, गंगा मेरी है निर्मलता।
मैं बुद्ध हूँ शोध का,
श्लोक मेरे हैं ब्रह्मांड के।
1. अपराजेय शक्ति और संतुलन:
भारत की आत्मा भगवान शिव के ‘रुद्र’ रूप की तरह शक्तिशाली है। इतिहास गवाह है कि इस माटी और इसके स्वाभिमान को न तो धरती की कोई ताकत झुका पाई, न आकाश की। हम विनाश की ‘राख’ से भी पुनर्जन्म होना जानते हैं और अन्याय के खिलाफ ‘ज्वाला’ बनना भी। इसके साथ ही, हमारी नींव में हिमालय जैसी स्थिरता और शांत ‘शीतलता’ भी है।
2. अनेकता में एकता (सर्व धर्म समभाव):
हमारी आजादी का सबसे बड़ा स्तंभ हमारी विविधता है। भारत के आँचल में गीता की सीख भी है और कुरान की रूहानी गहराई भी। यहाँ गुरु गोबिंद सिंह जी का स्वाभिमान और बलिदान हमारा ‘गुरूर’ है, तो माँ गंगा का बहता जल हमारी पवित्रता और ‘निर्मलता’ का प्रतीक है।
3. ज्ञान और शांति का संदेश:
भारत केवल शौर्य की भूमि नहीं है, यह गौतम बुद्ध के ‘ज्ञान और शोध’ की भी पावन धरा है। हमारे विचार और श्लोक किसी एक सीमा तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के कल्याण की बात करते हैं
आज का भारत केवल इतिहास का नहीं, बल्कि बुद्ध के ‘शोध’ और तकनीक की दिशा में बढ़ते युवा भारत का प्रतीक है।
5. नेताओं और सत्ताधीशों का ‘राज धर्म’:
नेता जो राजनीति में अपने आप को सत्ता के शीर्ष पर स्थापित करना चाहते हैं, क्या उन्हें अपना कर्म और आजादी की सच्ची परिभाषा पता है! क्या राजनीति में भी राज धर्म होता है अगर होता होगा तो आज वास्तविकता में आजादी का जशन मना रहे होते |
श्रीमद्भागवत गीता के तीसरे अध्याय (कर्मयोग) का 21वां श्लोक यह है:
“यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥”
श्रेष्ठ पुरुष (नेता या महान व्यक्ति) जैसा-जैसा आचरण, व्यवहार करते हैं, अन्य सामान्य लोग भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वे जो कुछ आदर्श तय करते हैं, पूरी दुनिया उसी पर चलती है |
जिस तरह से राजनीति में आदर्श और व्यवहार बदलते रहते हैं, उससे तो स्पष्ट संदेश है कि नेता का पहला और आख़िरी धर्म जन-कल्याण नहीं है| अपने स्वार्थ की रेखा को इतनी बड़ी और अपने हित में कर चुके हैं की ज्ञान और जन-कल्याण पीछे छूट गया है |
श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय (कर्मयोग) का 25वां श्लोक यह है:
सक्ता: कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत |
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ||
भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जिस प्रकार अज्ञानी जन फल की आसक्ति से कर्म करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष को भी संसार का मार्गदर्शन करने के लिए अनासक्त होकर कर्म करना चाहिए।
6. शहीदों के बलिदान का अपमान:
भगत सिंह, नेताजी और हज़ारों क्रांतिकारियों ने मौत के डर को इसलिए जीता था क्योंकि उन्हें गीता का वह ज्ञान पता था—“आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है” उन्होंने अपने प्राण इसलिए नहीं दिए थे कि हम आज़ादी के नाम पर देश को जातियों, धर्मों और घटिया राजनीति में बाँटकर आपस में लड़ें।
भगवद् गीता के दूसरे अध्याय का 20वां श्लोक आत्मा की अमरता और शाश्वतता को बताता है, जिसके अनुसार आत्मा का न कभी जन्म होता है और न ही मृत्यु
न जायते म्रियते वा कदाचि- नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो- न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
क्या हम सच में आजाद हैं? आजादी का भ्रम, गीता का ज्ञान और हमारी मानसिक गुलामी हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को लाउडस्पीकर पर देशभक्ति के गाने बजते हैं, तिरंगा फहराया जाता है और हम बड़े गर्व से कहते हैं—”हम आजाद देश के नागरिक हैं।”
लेकिन ज़रा रुकिए। अपनी छाती पर हाथ रखिए और अपनी आत्मा से पूछिए— क्या आप सच में आजाद हैं? आज का इंसान सोचता है कि “जो मन में आए वो करना ही आजादी है।” लेकिन जो मन आपसे करवा रहा है, क्या आप उसके मालिक हैं?
जिस देश की मिट्टी के हर कण में वीरों का रक्त मिला है, आज उस देश का नागरिक मानसिक रूप से पंगु हो चुका है। असली आजादी अधिकार मांगने में नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य को निभाने में है। आजादी वो नहीं कि आप वह हर काम कर सकें जो आप चाहते हैं, बल्कि आजादी वो है कि आपको वो न करना पड़े जो गलत है।
आज जिस खुली हवा में हम सांस ले रहे हैं, वो हमें मुफ्त में नहीं मिली है। इसकी एक बहुत बड़ी और भारी कीमत चुकाई गई है। उन हज़ारों गुमनाम वीरों का खून, जिनके नाम शायद कभी इतिहास के पन्नों में जगह भी नहीं पा सके। घर-बार, परिवार, जवानी और जीवन—सब कुछ कुर्बान कर दिया था ताकि आने वाली पीढ़ी (यानी हम) एक आजाद देश में आंखें खोल सके।
7. कड़वा सच:
आज 15 अगस्त के दिन, जब हम अपनी आजादी का जश्न मना रहे हैं, तो हमें यह याद रखना होगा कि हमारी ताकत हमारी इसी एकता, शक्ति और शांति में छिपी है। आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम अपनी इस महान संस्कृति और पहचान पर गर्व करें।
आज देश के नेता अगर संसद और रैलियों में भाषा की मर्यादा तोड़ेंगे, भ्रष्टाचार करेंगे और नफ़रत बोएंगे—तो देश की जनता भी वही सीखेगी। जब रक्षक ही भक्षक बनकर राजनीति का स्तर गिरा देंगे, तो देश में सच्चा ‘स्वराज्य’ कभी नहीं आ सकता।
श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय 16, श्लोक 15
अढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥
अर्थ: “मैं बड़ा धनी हूं, ऊंचे कुल का हूं, मेरे जैसा शक्तिशाली और कौन है? मैं दिखावे के लिए दान दूंगा, यज्ञ करूंगा और मज़ा करूंगा।” ऐसे लोग अज्ञान के अंधकार में मोहित रहते हैं।श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे भ्रष्ट और अहंकारी शासक प्रजा को गर्त में ढकेलते हैं और अंततः स्वयं भी विनाश को प्राप्त होते हैं।
आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! आपको यह कविता और इसका विचार कैसा लगा? अपने विचार नीचे कमेंट सेक्शन में ज़रूर साझा करें और इसे अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें | जय हिंद! जय भारत


Excellent
Azadi ka sahi matlab aur ehsas hi azadi hai. Azad sirf jeena nahi balki nibhana bhi hota hai.
apke hisab se sahi,galat aur naitik vikalp me antar he?
mere hisab se to naitikta aur saki, galat me bahut farak he . kuch cheez sahi hone ke baad bhi naitik roop se galat hote he aur kuch cheez galat hone ke bad bhi naitik roop se sahi hote he.