समय का चक्र ऐसा है जो किसी के लिए नहीं रुकता। जीवन में आने वाला हर पल बेहद अनमोल होता है। क्या आपने कभी भागते हुए समय को रोकने की कोशिश की है? या फिर मुट्ठी में पानी भरकर उसे बहने से रोकने का प्रयास किया है?
जीवन भी कुछ ऐसा ही है—क्षणभंगुर, चंचल और निरंतर बहता हुआ। बीते पलों को पकड़ने की व्यर्थ कोशिश करने के बजाय, जीवन के हर छोटे-बड़े क्षण और संघर्ष को स्वीकार करते हुए निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
इस कविता को लिखते समय मेरी एक बहुत गहरी याद जुड़ी है कि हम इंसान किस तरह जीवन के अनमोल पलों को गंवा देते हैं। हम हमेशा उन चिंताओं और विचारों में उलझे रहते हैं जो हमारे वश में हैं ही नहीं।
इसी चिंता में जो खूबसूरत पल हमें मिलते हैं, हम उन्हें जी नहीं पाते। और जब वे पल बीत जाते हैं, तब केवल समय के उस बहते चक्र की यादें रह जाती हैं।”
यह कविता जीवन की गतिशीलता, समय के प्रवाह और संघर्ष के बीच आगे बढ़ने के दर्शन को बहुत ही सूक्ष्म और काव्यात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है। “यह कविता मेरी काव्य-संग्रह (किताब) ‘यथार्थ‘ से ली गई है।”
कविता: ‘मुट्ठी से छूटते पल’
पल, आते-जाते…
बंद कर मुट्ठी को!
पानी पकड़ना क्या?अठखेली जीवन की…क्या?
छिटकता किरणों-सा,
मानसरोवर के उस कैलाश में!हिमकण की स्पर्श-ज्वाला में…
हलचल, हलचल; चल-चल-चलदेखती, घुमड़ती कौन-सा पथ—?
पल-पल, पल-पल… चल-चल-चलकण-कण, कण-कण विशाल, खारा;
जलकण, जलकण, जलकण।
1. समय की क्षण भंगुरता
“पल; आते/जाते… बन्द कर; मुठी को! पानी, पकड़ना क्या?”
समय पलों के रूप में लगातार आ रहा है और जा रहा है। मनुष्य की प्रवृत्ति होती है कि वह बीते हुए सुखद समय या पलों को रोक कर रखना चाहता है। बंद मुट्ठी से पानी फिसल जाता है, वैसे ही समय को बाँधकर रखना असंभव है। पकड़ने की यह कोशिश व्यर्थ है। पल आते हैं और चले जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के अध्याय 11, श्लोक 32 में स्वयं को ‘काल’ (समय) कहा है— “कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो”
(मैं लोक का क्षय करने वाला प्रवृद्ध ‘काल’ हूँ)। समय ईश्वर का ही रूप है, जो निरंतर गतिमान है। परिवर्तन को सहर्ष स्वीकार करने में ही बुद्धिमत्ता है।
2. जीवन की चंचलता और सौंदर्य
“अठखेली, जीवन की…; क्या? छिटकता किरणों-सा, मानसरोवर के उस कैलाश में!”
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के अध्याय 2, श्लोक 47— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”।
हमें याद दिलाता है कि हमारा अधिकार केवल कर्म पर है, पलों के मोह पर नहीं।
जीवन एक खेल की तरह बिखरता है। मानसरोवर और कैलाश पर्वत पर प्रातःकाल बिखरती सूरज की सुनहरी किरणों सी है। जैसे किरणें छिटककर पूरे पर्वत को आलोकित कर देती हैं पर उन्हें छूआ नहीं जा सकता, ठीक वैसे ही जीवन की खुशियाँ और पल बेहद खूबसूरत लेकिन चंचल हैं।
आर्थिक तंगी, किसी बीमारी, या व्यक्तिगत जीवन की बड़ी परेशानियों से गुजरने का समय, जहाँ आपकी सहनशक्ति और धैर्य की परीक्षा होती है।
3. बर्फ और ज्वाला का संगम
“हिमकण की; स्पर्श ज्वाला में..”
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के अध्याय 2, श्लोक 14— “मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः”।
सुख-दुख, अनुकूलता-प्रतिकूलता आने-जाने वाली हैं; धीर पुरुष इनसे विचलित हुए बिना आगे बढ़ता है।
‘हिमकण’ (शीतलता) और ‘ज्वाला’ (तपन) का संगम है, वैसे ही गीता कहती है कि सर्दी-गर्मी, सुख-दुख आने-जाने वाले हैं। धीर पुरुष इनसे विचलित हुए बिना निरंतर आगे बढ़ता है।
जीवन के असली रूप को दर्शाती है। जीवन में शीतलता (सुख) और ज्वाला (संघर्ष/अग्नि) दोनों का संगम है। ‘हिमकण’ (बर्फ की बूंद) शीतलता और शांति का प्रतीक है, जबकि ‘ज्वाला’ संघर्ष, कठिनाई और तपन का प्रतीक है। जब एक हिमकण ज्वाला के स्पर्श में आता है, तो वह पिघलकर बहने लगता है। यही जीवन है—जहाँ सुख और दुख, शांति और संघर्ष एक साथ मौजूद रहते हैं।
4. निरंतर गतिशीलता
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के अध्याय 6, श्लोक 5— “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्”
अपना उद्धार स्वयं करो, खुद को हताश मत होने दो
परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, मन में कितनी भी हलचल हो, जीवन का नियम केवल “चलते रहना” है। हर पल और हर कण के साथ हमें आगे बढ़ना ही होता है। आज जो विद्यार्थी पढ़ाई कर रहे हैं, उन सभी के लिए निरंतर गतिशील रहना बेहद ज़रूरी है। आपमें वह युवा शक्ति है जो समय के चक्र को बदलने का सामर्थ्य रखती है।
यदि आपने ध्यान न दिया हो, तो मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ—कभी किसी छोटे बच्चे को गिरकर सँभलते देखा है? वह गिरता है, रोता है, लेकिन हार न मानकर फिर कोशिश में जुट जाता है। वह रुकना जानता ही नहीं। अगर कोई उसकी मदद करने पहुँचे, तो वह और ज़ोर से रोने लगता है—मानो कह रहा हो कि उसे अपने पैरों पर ही खड़ा होना है!
यह सीख हमें भी अपनानी है। जिस तरह जल की एक-एक बूंद निरंतर बहते हुए नदी और अंततः सागर का रूप ले लेती है, ठीक उसी तरह किसी परीक्षा में असफल होने पर हमें हताश होकर रुकना नहीं है। हमें अपनी कोशिशों के एक-एक कण को जोड़ते हुए फिर से आगे बढ़ना है और सफलता हासिल करनी है।
जब जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं, तो मन में ‘हलचल’ और अनिश्चितता पैदा होती है। आँखें और मन ढूँढते हैं कि आगे ‘कौन-सा रास्ता’ चुना जाए। लेकिन विचारों के इस घुमड़ते बादलों के बीच भी कविता एक ही निर्देश देती है—”चल-चल-चल” (आगे बढ़ते रहो)।
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zindagi ke Khubsurati is cheez me he ki vo kisi ke liye rukte nhi he
Samay sabse balwan hai.