रक्षाबंधन — एक दिन का त्यौहार, साल भर का इंतज़ार

रक्षाबंधन — एक दिन का त्यौहार, साल भर का इंतज़ार

वक्त के साथ हम भले ही बड़े हो गए हों, लेकिन रक्षाबंधन का यह दिन हमें हर बार उसी मासूम बचपन में वापस खींच ले जाता है।

रक्षाबंधन एक ऐसा पवित्र बंधन है, जिसे मनाया तो सिर्फ एक दिन जाता है, लेकिन इसकी तैयारी साल के पूरे बारह महीने चलती रहती है।

एक भाई पूरे साल एक-एक पैसा जोड़कर अपनी बहन के लिए सबसे प्यारे उपहार की कल्पना करता है, जिसे वह रक्षाबंधन के दिन उसे सौंप सके। वह हर पल चुपके से यह जानने की कोशिश करता है कि उसकी बहन को क्या पसंद है। ठीक वैसे ही, बहन भी अपने भाई के लिए सबसे अनोखी और सुंदर राखी चुनना चाहती है—ऐसी राखी जो उसके भाई की कलाई पर सबसे अलग और खूबसूरत दिखे। भाई-बहन का यह निस्वार्थ प्रेम भले ही दुनिया को एक दिन दिखता हो, पर इसका इंतज़ार और अपनापन साल के हर एक दिन दिल में धड़कता है।

बचपन कितना मासूम होता है न! न कोई लोभ, न कोई छल, न किसी प्रकार की कड़वाहट या दुश्मनी। बचपन तो बस नादानियों का एक खूबसूरत ख़ज़ाना होता है। बड़े होने के बाद जब हम उन बीती यादों में खोते हैं, तो कभी-कभी आँखों से आँसू छलक आते हैं कि हमने कितना हसीन वक्त जिया था! आज की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में वो सुकून और शांति कहाँ, जो उस मासूम उम्र में हुआ करती थी।

भाई-बहन का रिश्ता दुनिया के सबसे अनूठे और पवित्र रिश्तों में से एक है। इसमें जहाँ एक तरफ बचपन की नादानियाँ, रूठना-मनाना और मासूम झगड़े होते हैं, वहीं दूसरी तरफ वक्त आने पर एक-दूसरे के लिए ढाल बनकर खड़े हो जाने की अटूट निष्ठा भी होती है।

उसी मासूमियत और बचपन की यादों में खोकर मैंने यह कविता लिखी है। जब भी मैं बच्चों को हँसते-खेलते देखता हूँ, मेरा दिल एक बार फिर बच्चा बन जाता है। भाई-बहन के रिश्ते की सबसे बड़ी ख़ासियत होती है उनका बचपन, जहाँ छोटी-छोटी बातों पर रूठना और अगले ही पल फिर से एक हो जाना चलता रहता है। मेरी यह कविता उन्हीं यादों का एक सच्चा और सजीव यथार्थ है…

कविता: नादानियों भरा रक्षाबंधन

आ जा, मैं खेलूँ तू खेले,
बचपन का प्यार फिर से खेलें।

मैंने नहीं लाई है मिठाई,
न मिला मुझे राखी।
तुमको मैं न बाँधूँगी राखी,
तू कैसे दिखाएगा अपने दोस्तों को?

चल कोई बात नहीं, मैं भूल गया तेरा गिफ़्ट,
क्योंकि खाई है मैंने आज ही चॉकलेट और आइसक्रीम।
नहीं खानी है तेरी मिठाई, मैं खेल के आता हूँ।

जा-जा, तू जा, मुझे भी नहीं रहना तेरे साथ,
बहुत देर कर दी तूने, सारा खेल आज ही खेलना था?
मैं रोई, तूने मनाया भी नहीं!

मैं भी बैठा था अकेला, कोई आज नहीं खेला।
चल, राखी तुझे बाँधती हूँ,
रक्षाबंधन हम मिलकर मनाते हैं।

नादानियाँ, रूठना और फिर एक हो जाना — यही तो है बचपन का रक्षाबंधन!

जहाँ  महँगे उपहार या औपचारिकताएँ कोई मायने नहीं रखतीं। यहाँ केवल दो मासूम दिलों का निश्छल प्यार है।

जहाँ बहन बिना किसी बनावट के कहती है कि न तो वह मिठाई लाई है और न ही राखी, पर साथ ही उसे भाई की चिंता भी है कि वह दोस्तों के सामने खाली कलाई कैसे दिखाएगा! जवाब में भाई का भी वही मासूम बचपन झलकता है—वह अपनी भूल छिपाने के लिए चॉकलेट और आइसक्रीम का बहाना बनाता है।

बहन का थोड़ा सा देर हो जाने पर रूठ जाना, रोना और भाई का इंतज़ार करना—यह हर घर की कहानी है। भाई भी कहीं न कहीं अकेला महसूस कर रहा है क्योंकि बहन के बिना उसका खेल भी अधूरा था।

बचपन का गुस्सा कुछ ही पलों का होता है। सारे गिले-शिकवे भूलकर, अंत में दोनों फिर से एक साथ आ जाते हैं। बिना किसी शर्त के राखी बँधती है और प्यार से रक्षाबंधन मनाया जाता है।

वक्त के साथ हम भले ही बड़े हो गए हों, लेकिन रक्षाबंधन का यह दिन हमें हर बार उसी मासूम बचपन में वापस खींच ले जाता है। क्या आपके बचपन में भी राखी पर ऐसी ही कोई खट्टी-मीठी नोक-झोंक हुई है? अपनी यादें नीचे कमेंट में ज़रूर साझा करें!

9 thoughts on “रक्षाबंधन — एक दिन का त्यौहार, साल भर का इंतज़ार”

  1. दीपेंद्र रावत

    समय चलता जाता है। हम बड़े हो जाते हैं, अपनी अपनी दुनिया और अपने नए रिश्तों में जीते हैं, पर यही जब रखी का त्योहार आता है तो फिर से बचपन लौट आता है। बहन को उपहार मिलने पर सबसे छोटे भाई का भी बदले में उपहार लेना।

  2. Mujhe sabse zyada pareshan karne wala insaan mera bhai hai, meri har cheez mein galti nikalne wala kabhi mujhe chain se rehne nahi deta. Par wahi mera best friend hai mujhe hamesha support krne wala. I love you mera golu polu.

  3. Pingback: रक्षाबंधन: बचपन की बेफिक्री और लम्हों का यथार्थ

  4. बहुत सुंदर से बातों को बताया गया है।😊 On the occasion of rakshabandhan the bond of love is doubled. Fabulous fantastic 😊

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