"Do thodi zindagi, je lene do... – Kya hum bachchon se unka bachpan cheen rahe hain?"

क्या हम बच्चों से उनका बचपन छीन रहे हैं?- 4 कडवे सच

हम बच्चों से उनका बचपन जिस तरह से छिनते जा रहे हैं, तो क्या कुछ समय में हम इंसान से […]

हम बच्चों से उनका बचपन जिस तरह से छिनते जा रहे हैं, तो क्या कुछ समय में हम इंसान से रोबोट बन जाएंगे, जिस पर किसी भावना का कोई असर नहीं होगा। वह सिर्फ़ एक मशीन की तरह रह जाएगा, तो उसके भीतर इंसानियत का नामों-निशान भी नहीं बचेगा।

हर बच्चा अपने साथ एक खूबसूरत कल की उम्मीद लेकर आता है। उनकी नन्ही उँगलियाँ खिलौने पकड़ने के लिए होती हैं, और कोमल कदम आज़ादी से दौड़ने के लिए। बच्चे देश का भविष्य हैं, उन्हें बोझ से नहीं, पंखों से भरें ताकि वे अपने सपनों की उड़ान भर सकें।

इसी दर्द और मासूम बचपन की निश्छल पुकार को बयां करती हैं ये बेहद भावुक पंक्तियाँ:

कविता: मासूम बचपन की पुकार

पांव मेरे हैं कोमल, हाथ मेरे हैं नन्हें-नन्हें,
मत बोझ मुझ पर इतना डालो, घायल हूँ मैं।
बचपन की नादानी कर लेने दो, मैं बोझ धरा का सहने वाला?
जी लेने दो पल-दो-पल, यह खेल कभी न आ पाएगा।

दे दो थोड़ी जिंदगी, मैं हूँ पवन,
अपनी चाहत में मुझे छोड़ दिया, शीश हिमालय रख डाला।
मैं नन्हा-मुन्ना, तोड़ लेने दो तेरी खुशियों को,
बस जी लेने दो, बस जी लेने दो एक बार…

1. “पांव मेरे हैं कोमल, हाथ मेरे हैं नन्हें-नन्हें,” — क्षमता से अधिक दबाव

बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत कोमल होते हैं। जब उन पर बड़ी-बड़ी ज़िम्मेदारियों या पढ़ाई/सपनों का अत्यधिक दबाव डाला जाता है, तो उनका मन अंदर से टूट जाता है। बच्चे अपना बचपन कब का भूल चुके हैं, या यूँ कहें कि उनसे उनका बचपन जबरदस्ती भुला दिया गया है।

हम जिस बाल-मजदूरी की बात करते हैं, उसकी नींव आज समाज बाहर नहीं, बल्कि हम खुद अपने घरों में और अपने ही बच्चों के साथ रख रहे हैं।

आज हमने अपने बच्चों को जीवन जीने के लिए छोड़ा ही नहीं है। हमने उन्हें पैसा कमाने और सफलता हासिल करने की एक ऐसी मशीन बना दिया है, जिसकी चाबी हमारे हाथों में है। जिसे हम बच्चे की ‘काबिलीयत’ या ‘टैलेंट’ कहकर दुनिया को दिखाते हैं, उसके पीछे का सच यह है कि बच्चा अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि हमारे दबाव में जी रहा है।

जो सपने पेरेंट्स अपने जीवन में पूरे नहीं कर पाए—चाहे वह डॉक्टर बनना हो, टॉपर बनना हो या किसी बड़े पद पर पहुँचना हो—वे उन सपनों का ‘हिमालय जैसा विशाल बोझ’ अपने मासूम बच्चे के सिर पर रख देते हैं।

2.  “यह खेल कभी न आ पाएगा” — खोता हुआ बचपन

बचपन में की गई नादानियाँ और खेल-कूद ही जीवन का सबसे खूबसूरत हिस्सा होते हैं। एक बार यह समय बीत जाए, तो दुनिया की कोई दौलत इसे वापस नहीं ला सकती। आज जिस रफ्तार से हम बच्चों पर हर चीज़ का दबाव डाल रहे हैं, उससे एक बड़ा ख़तरा पैदा हो गया है: हम उन्हें जीवन जीना नहीं, सिर्फ़ दौड़ना सिखा रहे हैं।

आज हमने अपने बच्चों का बचपन छीनकर उन्हें रोबोट बना दिया, तो कल जब वे बड़े होंगे, तो उनके पास हमारे लिए भी कोई ‘भावना’ नहीं होगी। वे हमें भी सिर्फ़ एक पुरानी और बेकार मशीन समझकर किनारे कर देंगे। यही यथार्थ होगा, निर्णय हमारे हाथ में है!

३. “हवा सा आज़ाद, पर सर पर हिमालय”

बच्चा हवा (पवन) की तरह आज़ाद बहना चाहता है, लेकिन हम अपनी चाहतों और उम्मीदों का ‘हिमालय’ उनके छोटे से सिर पर लाद देते हैं। आज जिस अंधी प्रतिस्पर्धा (Competition) को हम “उज्ज्वल भविष्य” का नाम दे रहे हैं, क्या वह सच में युवा शक्ति का भविष्य है?

सच तो यह है कि हम भविष्य के नाम पर इंसान के अस्तित्व को ही ख़त्म करते जा रहे हैं। हम एक ऐसे निर्मम और क्रूर समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ सिर्फ़ ‘जीतना’ मायने रखता है, किसी का दर्द या संवेदना नहीं। हर बच्चे का बचपन रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके ख़त्म हो रहा है, और हम इस तबाही को ‘विकास’ समझ रहे हैं।

4. हमें ठहरकर खुद से कुछ सवाल पूछने होंगे:

1. क्या हम उन्हें बच्चा रहने दे रहे हैं?   हम उन्हें अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरा करने का ज़रिया बना रहे हैं? हम सब केवल इसके गुनहगार ही नहीं हैं, बल्कि इस धरती पर एक ज़हरीली रचना रच रहे हैं। जब एक बच्चे को बचपन से ही सिर्फ़ ‘नंबर लाने’, ‘कॉम्पटीशन जीतने’ और ‘सबको पछाड़ने’ की सीख दी जाती है, तो उसके भीतर से दया, सहानुभूति और प्रेम जैसी मानवीय भावनाएँ ख़त्म होने लगती हैं।

यदि यही सिलसिला चलता रहा, तो आने वाले कुछ सालों में हमारे बीच इंसान नहीं, बल्कि ‘हड्डी-मांस के बने रोबोट’ घूम रहे होंगे। एक ऐसा समाज तैयार हो रहा है जिसे किसी के दर्द से कोई मतलब नहीं होगा, जिसे सिर्फ़ अपने प्रोफ़िट (Profit) और टारगेट (Target) से मतलब होगा।

2. बाल श्रम और शोषण पर रोक: हम जब भी ‘बाल-मजदूरी’ (Child Labour) शब्द सुनते हैं, तो हमारी आँखों के सामने किसी ढाबे पर बर्तन धोता, ईंट-भट्ठे पर गारा उठाता या सड़क पर भीख माँगता हुआ कोई लाचार बच्चा आता है। हम तरस खाते हैं, सरकार और समाज को कोसते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।

लेकिन ज़रा रुकिए और अपने घर के भीतर झाँकिए! क्या हमने बाल-मजदूरी को एक नए, चमकदार और सामाजिक रूप से स्वीकृत (Socially Accepted) लिफ़ाफ़े में बंद करके अपने ही घरों में शुरू नहीं कर दिया है?

आज का कड़वा सच यह है कि हम बाल-मजदूरी के खिलाफ़ सिर्फ़ बातें करते हैं, जबकि उसकी असली नींव हम खुद अपने बच्चों से, अपने ही घर के ड्राइंग रूम में करवा रहे हैं।

3. मानसिक आज़ादी: आज के दौर में बच्चों को जीवन जीने के लिए छोड़ा ही नहीं जा रहा। बहुत छोटी उम्र से ही बच्चों को “टैलेंट”, “चाइल्ड आर्टिस्ट”, “सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर” या “वंडर किड” का टैग देकर उनसे दिन-रात काम कराया जा रहा है।

हम भूल गए हैं कि गलतियाँ करना और बेफिक्र नादानियाँ करना ही बचपन की पहचान है। जब हम बच्चे से कम उम्र में ही एक परिपक्व (Mature) वयस्क की तरह व्यवहार करने और हर चीज़ में ‘परफेक्ट’ होने की उम्मीद करते हैं, तो उसका कोमल मन अंदर से घायल हो जाता है।

एक असफल परीक्षा सुधारी जा सकती है, लेकिन एक टूटा हुआ और अवसाद ग्रस्त बचपन कभी ठीक नहीं किया जा सकता। बच्चों को खिलने दीजिए, उन्हें उड़ने दीजिए—क्योंकि वे आपकी संपत्ति नहीं, इस दुनिया का खूबसूरत भविष्य हैं!

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3 thoughts on “क्या हम बच्चों से उनका बचपन छीन रहे हैं?- 4 कडवे सच”

  1. यह सब बिल्कुल सही हैं।आज कल हमने बाल मजदूरी की शुरुआत घर से ही कर दी।
    वेरी ट्रू।

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